बांसुरी वाला कविता।
बांसुरी वाला
अम्मा
मुझे
बाँसुरी
ले दो,
मैं भी
उसे
बजाऊँगा।
ग्वाले
का
कुछ
काम
नहीं
है,
मैं
ही
गाय
चराऊँगा।
यों
ही
कु
छ
दिन
करते-करते,
ज्यों
ही
कु
छ
बढ़
पाऊँगा।
बैठ
किसी
रथ
पर
गोकुल
से,
मैं
भी
मथुरा
जाऊँगा।
जो
लड़ने
आएँगे
कुष्टी,
मैं
तो
उन्हें
हरा
दूँगा।
मार
कं
स
मामा
को
असुरों
को,
भी
खूब
डरा
दूँगा।
मामा
बुरे
न
होंगे
तो
मैं,
उनसे
मिलने
जाऊँगा।
और
जरूरत
समझी
तो
कु
छ,
गीता
उन्हें
पढ़ाऊँगा।
चीर
द्रौपदी
का
खींचा
था,
दुःषासन
था
अभिमानी।
इस
पर
कौरव
पांडव
ने
की,
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